महिला अधिकारी को DGP बनाने के लिए बदला नियम, सुप्रीम कोर्ट में झारखंड सरकार ने रखा पक्ष

झारखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति से संबंधित याचिका पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष इस मामले पर बहस हुई। इस दौरान झारखंड सरकार की तरफ से अदालत को अवगत कराया गया कि राज्य की एक वरिष्ठ महिला आईपीएस अधिकारी को शीर्ष पद का मौका देने के उद्देश्य से नियुक्ति नियमों में संशोधन किया गया।

कपिल सिब्बल ने रखा राज्य सरकार का पक्ष
याचिकाकर्ता बाबूलाल मरांडी की ओर से दलीलें पूरी होने के बाद राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने अदालत को जानकारी दी कि झारखंड सरकार ने शीर्ष अदालत के पूर्व आदेशों व दिशा-निर्देशों के तहत ही अपनी DGP नियुक्ति नियमावली तैयार की है। सिब्बल ने स्पष्ट किया कि न्याय मित्र (Amicus Curiae) ने पूरी नियमावली पर नहीं, बल्कि केवल नियम-5 में किए गए बदलाव पर आपत्ति दर्ज कराई है।

तदाशा मिश्रा को डीजीपी रैंक में प्रोन्नति का हवाला
राज्य सरकार ने नियम-5 में किए गए संशोधन का बचाव करते हुए कहा कि तदाशा मिश्रा झारखंड कैडर में DGP पद पर प्रोन्नत होने वाली इकलौती महिला आईपीएस अफसर हैं। सरकार की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने राज्य में उग्रवाद (नक्सलवाद) और अपराध नियंत्रण के मोर्चे पर बेहद प्रभावी कार्य किया है। इसी कारण सरकार ने इस सक्षम महिला अधिकारी को अवसर देने के लिए नियमावली के नियम-5 में संशोधन का कदम उठाया।
24 सितंबर को अगली सुनवाई
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने शीर्ष अदालत से कहा कि एमिकस क्यूरी की विस्तृत रिपोर्ट पर राज्य सरकार अपना जवाब दाखिल करेगी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ झारखंड में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर जरूरी दिशानिर्देश जारी कर सकती है। इस मामले में अगली सुनवाई 24 सितंबर को होना तय की गई है।
इससे पहले, याचिकाकर्ता बाबूलाल मरांडी के वकील ने अदालत में आरोप लगाया था कि झारखंड में DGP की नियुक्ति प्रक्रिया में राज्य सरकार की तरफ से लगातार मनमानी की जाती रही है।

